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Bollywood Trend: सिनेमा, सेना और सैन्य सामग्री | – News in Hindi

भारतीय सेना और युद्ध पर आधारित फिल्में अब कोई नई बात नहीं रह गई है. बीते कुछ वर्षों में इन फिल्मों के निर्माण में काफी तेजी सी भी आयी है. बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक और गलवान घाटी संघर्ष पर कई फिल्में बन रही हैं. इसके अलावा कुछ ऐसे सैन्य घटनाक्रम और वीर जांबाजों के जीवन पर भी फिल्में बन रही हैं, जिनके बारे में आमजन को कम जानकारी है. लेकिन जरा एक पल को सोचिए कि क्या कोई भी सेना या कोई भी जवान बिना हथियारों के जंग लड़ सकता? अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों, वाहनों, विमान वाहकों, बम वर्षक विमानों, युद्ध पोतों, मिसाइलों इत्यादि में से कोई एक चीज भी अगर कमतर हो या न हो तो क्या कोई देश युद्ध की सोच भी सकता है?

बगैर हथियार के कैसा युद्ध? पता नहीं फिल्मकारों को बहादुर सैनियों की ही तरह भारतीय सेना के किसी टैंक, फाइटर जेट, युद्ध पोत या पनडुब्बी को युद्ध के एक महत्वपूर्ण किरदार की तरह पेश करने से किसने रोका हुआ है. विदेशी फिल्मों में कई दशकों से इस विषय को न केवल भुनाया जाता रहा है बल्कि अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, चीन, फ्रांस आदि जैसे देशों ने अपनी सैन्य शक्ति का दमखम दिखाने के लिए इसका खूब इस्तेमाल भी किया है. अतीत में झांककर देखें तो सैन्य साज-ओ-सामान से जुड़ी शौर्य और पराक्रम की अनेकों गाथाएं अपने यहां भी मिलेंगी. भारतीय सेनाएं सक्षम रही हैं कि हम भी लड़ाकू विमान आधारित टॉप गन जैसी या टैंक पर टी-34, युद्धपोत पर मिडवे और पनडुब्बी पर आधारित क्रिमसन टाइड जैसी फिल्में बना सकते हैं.

चाहिए जोड़ी जय-वीरू जैसी

क्या एक पायलट का अपने फाइटर जेट के साथ हाथी मेरे साथी जैसा नाता नहीं हो सकता? युद्धभूमि में क्षतिग्रस्त किसी टैंक के अंतिम पलों में उसके कमांडर, गनर, लोडर और ड्राइवर की मनोदशा को तमाम फिल्मकार अब तक कैसे अनदेखा करते रहे. साथ जीने मरने की कसमें खाने वाली जोड़ी सिर्फ जय-वीरू की ही बन सकती है, किसी टैंक और उसके सदस्यों के बीच क्यों नहीं. और आधुनिक युग के विमान वाहक युद्ध पोत के दृश्य और दास्तानें तो अविश्वसनीय लगती हैं, जो एक सेना के पूरे लाव लश्कर को अपने विशाल चट्टान से सीने पर ऐसे लिए चलता है मानो देवता ने पर्वत सिर पर उठा रखा है.पिछले दिनों आईएनएस विक्रांत के अनावरण की तस्वीरें देख देशवासियों को गर्व का कुछ ऐसा ही अहसास हुआ होग. बेशक, सिनेमा इस अहसास को और बढ़ने में मदद कर सकता है. बाहर ऐसी फिल्में काफी पहले से बन रही है और अलग-अलग दौर में यह चलन खूब फला फूला भी है. लेकिन अब शायद हमारे कुछ फिल्मकार भी युद्ध में इस्तेमाल की जाने वाले सैन्य साज-ओ-सामान मसलन, जेट फाइटर प्लेन, टैंक, युद्धपोत, तोप, पनडुप्पी, विध्वंसक इत्यादि पर फोकस करते दिख रहे हैं.

दरअसल, कुछ साल पहले आयी फिल्म ‘दि गाजी अटैक’ (2017) से एक हल्की सी शुरूआत तो हुई ही थी. इस फिल्म के जरिए एक आम दर्शक भारतीय नौसेना की सैन्य शक्ति के बारे में करीब से जान पाया, साथ ही उस मिशन के बारे में भी जो तब के आईएनएस विक्रांत को तबाह करने के इरादे से पाकिस्तानी सेना द्वारा रचा गया था. भारतीय पनडुब्बी एस-21 (जिसे निगरानी के लिए भेजा गया था) ने दुश्मन के मंसूबों को विफल कर दिया था. बावजूद इसके यह फिल्म आईएनएस विक्रांत और एस-21 पनडुब्बी का परिचय एक किरदार के तौर पर करा पाने में कसर छोड़ देती है. मसलन, इस फिल्म में ही दुश्मन अपने मुंह से कह रहा है कि आईएनएस विक्रांत यानी हिंद के समंदर का हाथी, के होते हुए पूर्वी पाकिस्तान तक सप्लाई नहीं पहुंचा सकता. वह खौफजदा है 21 विमान वाहक के रूप में इसकी क्षमता से और जो लैस है सी हाक्स, अलीज फ्रेंच एंटी-सबमरीन जैट, लांग रेंज राकेट लांचर इत्यादि से. बस, जरूरत थी इन इनपुट को एक्शन के जरिए दिखाने और महसूस कराने की.

वैसे, आज हमारे सामने एक बिलकुल नया और पहले से कहीं ज्यादा मजबूत, विराट, शक्तिशाली और उन्नत विमान वाहक युद्ध पोत आईएनएस विक्रांत है, जिसका एक किरदार के रूप में अतीत कई वीर गाथाओं से अटूट रिश्ता भी रहा होगा. अब जरूरत है उसे इसी की जुबानी कहे जाने की. अतीत में झांकने पर ऐसा ही रिश्ता कारगिल युद्ध और बोफोर्स तोप के बीच भी दिखता है. एक संबंध बालाकोट और मिग-21 का भी है. हालांकि कुछेक फिल्मकारों का कैमरा घूमा तो है, जिसके चलते टी-55 और पीटी-76 सरीखे टैकों की कहानियां जल्द सामने आएंगी. लेकिन उससे पहले जानते हैं कि सिनेमा के परदे पर जब अस्त्र-शस्त्र एक किरदार के रूप में अवतरित होते हैं तो कैसा प्रभाव छोड़ते हैं.

आसमान में आंखें गड़ाए लड़ाकू जेट

ताजा उदाहरण अमेरिकी अभिनेता टॉम क्रूज की ब्लॉकबस्टर फिल्म टॉप गनः मैवरिक का है, जो इन दिनों पूरी दुनिया में धमाकेदार बिजनेस कर 1.442 बिलियन डॉलर बटोरकर कोरोनाकाल की (स्पाइडर-मैनः नो वे होम, 2021 के बाद) दूसरी सबसे ज्यादा कलेक्शन करने वाली फिल्म बन चुकी है. मूल फिल्म ‘टॉप गन’ (1986) के 36 साल बाद आए इसके सीक्वल को भारत में लगातार चलते हुए 100 दिन से ज्यादा हो गए हैं. हालांकि बिजनेस (लगभग 48 करोड़ रुपए) कुछ खास नहीं हुआ यहां, पर 11 हफ्तों बाद भी यह कई सिनेमाघरों से चिपकी हुई है. जो लोग ‘टॉप गन’ की लीगेसी से वाकिफ हैं वह शायह यह भी समझते होंगे कि मुनाफा और नाम कमाने से इतर यह फिल्म कैसे एक कल्ट क्लासिक बनी.

हालांकि, ऊपरी तौर से देखने पर ‘टॉप गन’ शायद एक स्टाइलिश फिल्म से ज्यादा ना लगती हो, जिसने उस दौर में आए नए नवेले चॉकलेटी इमेज वाले टॉम को बड़ा लॉन्चिंग पैड दिया था. हां, यह सही भी कि रिडली स्कॉट निर्देशित इस फिल्म में काम करते समय टॉम की उम्र 24 वर्ष थी और इस मात्र एक फिल्म की बदौलत वह सुपरस्टार की रेस में आ गए थे, वो भी उस दौर में जब सिल्वेस्टर स्टेलन और ऑर्नोल्ड श्वॉर्जनेगर जैसे हैवीवेट एक्शन स्टार्स का इंडस्ट्री में बोलबाला था. लेकिन यह फिल्म टॉम क्रूज की दिलचस्प स्टिकरों से पटी लेदर जैकेट, कावासाकी बाइक, एविएटर सनग्लासेज, च्विंगम और अपनी इंस्ट्रक्टर संग चुहलबाजियों से हटकर एक उद्देश्यपूर्ण फिल्म थी जो रेगन काल (अमेरिकी राष्ट्रपति रोनॉल्ड रेगन) में वर्ल्ड्स बेस्ट अमेरिकन पायलट्स के ठप्पे के साथ आयी थी.

फिल्म के दोनों भागों की बात करें तो इनमें यूएसएस एंटरप्राइज, अब्राहम लिंकन नामक विमान वाहक युद्ध पोत, एफ-14 टॉमकैट, नॉर्थरॉप एफ-5 (मिग-28 के रूप में) और ए-4 स्काईहैक जैसे सैन्य विमानों के साथ-साथ मौजूदा दौर के अत्याधुनिक सुखोई एसयु-57 के बीच हिचकोले खाते द्वंद (वीएफएक्स और सीजीआई प्रभाव के साथ) के चित्रण हैं. इन्हें फिल्म के भावनात्मक दृश्यों के साथ बड़े संजीदगी से पिरोया गया है. खासतौर से मिशन पर जाते समय और जीत के बाद युद्धपोत के डेक पर लौटने के पल.

गायिका टैरी नन की आवाज में बर्लिन (उस दौर का न्यूवेव बैंड) बैंड का प्रसिद्ध गीत ‘टेक माई ब्रेथ अवे…’ का म्यूजिक वीडियो फिल्म की थीम से मेल खाता हो इसके लिए वीडियो को कैलिफोर्निया स्थित मोजावे एयर एंड स्पेस पोर्ट में बेकार और रिटायर हो चुके विमानों के बीच शूट किया गया था. बेस्ट अमेरिकी पायलट और एफ-14 विमान के बीच संबंध स्थापित करने के लिए, जहां पहले भाग में मैवरिक (टॉम क्रूज) और आईसमैन (वॉल किलमर) एफ-14 के जरिए चार मिग विमानों को उड़ा देते हैं, जबकि दो मिग डरकर भाग जाते हैं, तो वहीं दूसरे भाग में एफ-14 का सामना रूसी सुखोई-57 से दिखाया गया है. यानी एक पायलट चाहे तो अपनी सूझबूझ से पुराने विमान से नए अत्याधुनिक विमान का भी मुकाबला कर सकता है, जबकि वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिकी टीन सिरीज के तहत एफ-14 को तो बनाया ही रूसी निर्मित मिग के खिलाफ लड़ने के लिए था. टॉप गन अपने उद्देश्यों में सफल दिखती है.

यहां सन 1982 में आयी क्लिंट ईस्टवुड अभिनीत एवं निर्देशित फायरफॉक्स या कुछ अन्य फिल्में जैसे ‘ब्लू थंडर’ (1983), ‘आयरन ईगल’ (1986) के उदाहरण भी जोड़ दें तो उस दौर की कई अमेरिकी फिल्मों में अपने सैन्य पराक्रम और शक्ति प्रदर्शन हेतु लड़ाकू विमान या हेलिकॉप्टरों को एक किरदार की तरह पेश करने का चलन देखने को मिलता है. फिर भले ही प्रतिद्वंदी (ज्यादातर मौकों पर रूसी लड़ाकू विमान) चाहे कितना ही प्रबल, उन्नत या काल्पनिक ही क्यों न हो, पटखनी तो देनी बनती है. निकोलस केज की ‘फायर बर्ड्स’ (1990), ‘ब्लैक हॉक डाउन’ (2001), जिसमें मिलिट्री हेलिकॉप्टर ब्लैक हॉक को प्रमुखता से दिखाया गया है, के अलावा ‘टीअर्स ऑफ दि सन’ (2003), ‘फ्लाई ब्वायज’ (2006), ‘स्टेल्थ’ (2005) इत्यादि के साथ यह कवायद बाद तक जारी रही.

धधकते, धमकते आग बरसाते टैंक

आमने-सामने की जमीनी लड़ाई में दो टैंकों की भूमिका, आक्रामक ग्लेडिएटर योद्धाओं जैसी लगती है. एक किरदार के रूप में दो टैंकों भिड़ंत को कुछ रूसी फिल्मों में प्रमुखता से जगह दी गई है. रोचकता के लिहाज से फिल्म ‘टी-34’ में एक ऐसे ही सीन को देखकर फिल्म ‘तेजाब’ का क्लाईमैक्स याद आता है, जहां मुन्ना (अनिल कपूर) और लोटिया पठान (किरण कुमार), हाथों में चाकू पकड़े एक जंग खाए पानी के जहाज पर एक-दूसरे को मारने के लिए दौड़ते है. रूसियों और जर्मनों का अपने-अपने टैंकों को लेकर गुमान ‘टी-34’ (2019) में साफ दिखता है. सन 1941, द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि लिए इस फिल्म रूसी टैंक टी-34 और जर्मन टैंक पैंजर 3 की सीधी भिड़त तो है ही, साथ ही दो सैन्य अफसरों के बीच जिंदगी और मौत की रस्साकशी भी है, जो अलग-अलग तरह के दांव-पेंचों के साथ काफी दिलचस्प है. फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक तरफ क्षतिग्रस्त टी-34 टैंक के बल पर एक जूनियर लेफ्टिनेंट और उसके साथी न केवल पैंजर 3 से लोहा लेते हैं, बल्कि अपने घायल टैंक को दुरुस्त कर जर्मन कैद से भाग निकलने में सफल भी होते हैं.

फिल्म में पूरा फोकस केवल टैंकों पर है, यह बताते हुए कि टैंकों से शातिराना अंदाज में जंग कैसे लड़ी जा सकती है तथा टैंक संचालन में कमांडर की क्या भूमिका होती है, लोडर और गनर कैसे एक्शन लेते हैं जबकि ड्राइवर को इनके साथ तालमेल बैठाना होता है. शह और मात का लगभग ऐसा ही खेल एक अन्य रूसी फिल्म ‘व्हाइट टाइगर’ (2012) में भी देखने को मिलता है, जिसमें द्वितीय विश्व युद्ध (1943) के दौरान एक रहस्यमयी एवं अजेय व्हाइट टाइगर नामक टैंक की तलाश है, जिसका सामना करने के लिए टी-34 के उन्नत और विकसित मॉडल को तैयार किया जाता है. सोवियत-रूसी आर्मी में टी-34 टैंक का महत्व ऐतिहासिक है. बीते करीब 80 वर्षों में पचास से अधिक देश इसे खरीद चुके हैं, जबकि एक दर्जन देश अब भी सेना में इसका रूटीन इस्तेमाल कर रहे हैं. साल 2018 में आयी टैंकर्स नामक एक अन्य रूसी फिल्म में केवी-1 टैंक की विशेषताओं का वर्णन मिलता है.

इसके अलावा टैंक आधारित फिल्म में समर्पण, संघर्ष और तत्परता के साथ-साथ भावनात्मक जुड़ाव ब्रैड पिट्ट की फिल्म ‘फ्यूरी’ (2014) में भी देखने को मिलता है, जिसकी पृष्ठभूमि 1945 में समाप्ति की ओर बढ़ रहे द्वितिय विश्व युद्ध की है. अमेरिकी टैंक कमांडर डॉनल्ड कॉलियर उर्फ डॉन उर्फ वॉरडैडी (ब्रैड पिट्ट) के हाथ में अमेरिका में निर्मित शरमन ई 8 टैंक की कमान है, जिसका नाम है फ्यूरी और इसका सामना होता है जर्मनों के टाइगर 1 टैंक से जो वजन, गोले, बख्तर सहित हर मामले में शरमन से इक्कीस है. बावजूद इसके वॉरडैडी अपनी टीम के साथ दुश्मनों की सरजमीं फ्यूरी के साथ टिका रहता है.

देसी परदा, कैसा है जोश

‘उरीः दि सर्जिकल स्ट्राइक’ (2019) में मिशन के लिए सैनिकों की नई ड्रेस, ऑटोमैटिक गन्स, हेलिकॉप्टर, मिसाइल्स, रॉकेट लांचर, सर्विलॉन्स तकनीक इत्यादि पर बारीकी से फोकस किया गया है. ऐसा केन्द्रित दृष्टिकोण फरहान अख्तर निर्देशित लक्ष्य (2004) में भी दिखा था, जो लगभग बीस साल पहले अपने नएपन के लिए सराही गई थी. कुछ ऐसी ही नएपन की उम्मीद इशान खट्टर की फिल्म ‘पिप्पा’ से भी है. दरअसल, सन 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान भारतीय सेना के पास टैंक ऐसा था, जो अपने नाम और काम से आज भी जाना जाता है. ब्रिगेडियर बलराम सिंह मेहता की किताब दि बर्निंग चाफीज पर आधारित, राजा कृष्ण मेनन द्वारा निर्देशित इस फिल्म में इशान के अलावा दूसरा हीरो वही पीटी-76 टैंक है, जो उस समय भारतीय सेना में पिप्पा के नाम से मशहूर था.

आज बेशक लेपर्ड 2ए7, के2 ब्लैक पैंथर और टी 90 जैसे शक्तिशाली विध्वंसक टैंकों के बिना जमीनी लड़ाई की कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन पचास के दशक में सेवियत निर्मित पीटी-76 टैंक जमीन के अलावा पानी में भी लड़ने में सक्षम था. दरअसल, सन 1965 में सेना की 45वीं कैवेलरी को आवंटित किए गए इस टैंक की देखरेख में जुटे कुछ सिख सैनिकों ने जब इसे पानी में जब उतरते देखा तो वह इसे पिप्पा पिप्पा बुलाने लगे. बस तभी से इस टैंक का नाम पिप्पा पड़ गया.

फिल्म में दर्शक देख सकेंगे कि कैसे कैप्टन मेहता और पिप्पा ने मिलकर पाकिस्तानी जनरल नियाजी के मंसूबों पर पानी फेरते हुए दुश्मन के बेड़े में शामिल 14 अमेरिकी एम-24 चाफी टैंकों को नेस्तोनाबूत कर दिया था. फिल्म के निर्माता सिद्धार्थ रॉय कपूर और रॉनी स्क्रूवाला हैं जिन्हें श्रेय हासिल है ‘उरीः दि सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी फिल्म के निर्माण का. इसलिए पिप्पा से अच्छे परिणाम की उम्मीद की जा सकती है. वैसे, इस कड़ी में कपूर और स्क्रूवाला की जोड़ी सर्वेश मेवारा के निर्देशन में फिल्म ‘तेजस’ का निर्माण भी कर रही है जिसमें कंगना रनोट भारतीय वायु सेना के एक हवाई लड़ाकू दल में महिला फाइटर पायलट की मुख्य भूमिका में दिखाई देंगी. कई दशकों की अथक मेहनत के बाद सेना में शामिल होने को तैयार तेजस को गेम चेंजर बताया जा रहा है, जो भविष्य मिग-21 सहित कुछ अन्य लड़ाकू विमानों की जगह ले सकता है.

असल में बीते सौ सवा सौ वर्षों में आसमानी जंग का स्वरूप आज इस कदर बदल चुका है कि लड़ाकू विमानों की उन्नत किस्में पहली पीढ़ी के सुपरसॉनिक जेट फाइटर्स से होते हुए पांचवी पीढ़ी के सुखोई-57 को पीछे छोड़ अब छठी पीढ़ी की तरफ बढ़ गई हैं. निश्चित रूप से भारत भी इसमें शामिल है और तेजस के बहाने इसकी झलक हमें फिल्म में देखने को मिलेगी, जिसकी कहानी सच्ची घटनाओं पर आधारित बताई जा रही है और 2015 में उस घटनाक्रम के आस-पास घूमती है जब वायु सेना के लड़ाकू दल में बतौर महिला फाइटर पायलट भर्ती की स्वीकृति दी गई थी. इसके अगले साल लड़ाकू स्क्वाड्रन में पहली बार तीन महिला पायलटों को जगह दी गई थी.

यहां सवाल आ सकता है कि आखिर यह फिल्म है किसके बारे में? लड़ाकू स्क्वाड्रन की एक महिला पायलट के बारे में या विश्व के सबसे हल्के लड़ाकू विमानों में से एक तेजस के बारे में, जिसकी अभिकल्पना, विकास, निर्माण और उत्पादन सब भारत में ही हुआ है. दरअसल, यहां दोनों ही बातें महत्वपूर्ण हैं. बतौर महिला फाइटर पायलट, लड़ाकू स्क्वाड्रन में शामिल होनी की प्रक्रिया, अनुभव, ट्रेनिंग इत्यादि तो है ही, साथ ही तेजस की खूबियां भी अपने आप में किसी किरदार से कम नहीं हैं. वैसे, एक तरफ इस रोल के लिए कंगना रनोट ने विशेष युद्ध तकनीक सीखने के लिए चार महीनों की जबरदस्त ट्रेनिंग ली है तो दूसरी ओर तेजस की खूबियों के चलते अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मिस्र, अर्जेंटीना और फिलिपीन जैसे देशों में इसमें दिलचस्पी दिखाई है.हैरत की बात है कि अमेरिका जो खुद युद्धक विमान बनाने और तकनीक में अग्रणी रहा है, वह भी तेजस के तेज को आंक रहा है. तो उधर, मलेशिया अपने अधिग्रहण कार्यक्रम के तहत तेजस खरीदने की योजना बना चुका है तथा भारत ने उसे 18 तेजस विमान बेचने का प्रस्ताव दिया है.

दरअसल, तेजस के बहाने यह हमारे फिल्मकारों के पास एक सुनहरा मौका है जब वह ‘टॉप गन’ या इस श्रेणी की फिल्मों जैसी प्रस्तुति दे सकते हैं. न केवल बेस्ट पायलट के टैग के साथ, बल्कि तेजस जैसे तेज तर्रार विमान के साथ भी, जिसकी निशाना लगाने और बम गिराने की सटीकता सुखोई-30एमकेआई के बराबर बताई जाती है. तेजस का नौसेना संस्करण, भारतीय विमान वाहक पोतों से उड़ान भरने में सक्षम है. थल और नभ के बाद अब आते हैं जल यानी समुद्र में होने वाली जंग पर, जिसका इतिहास तो कई सदियों पुराना है पर आज जब हम कई सारे देशों को किसी महासागर में संयुक्त रूप से युद्ध-सैन्य अभ्यास करते देखते हैं तो उनकी ताकत के रूप में जेराल्ड आर. फोर्ड क्लास, आईएनएस विक्रांत, चार्ल्स दि गॉल जैसे अब तक से सबसे विराट युद्ध पोतों, रक्षक बेड़ों एवं वायुयान वाहक पोतों की हैरतअंगेज तस्वीर देखने को मिलती है. और पानी के भीतर घात लगाकर हमले की बात करें तो टायफून क्लास, ओहियो-क्लास, वैंगार्ड क्लास जैसी पनडुब्बियां, जो समंदर में 10 हजार मीटर गहराई तक जा सकती हैं और 600 से 12 हजार किमी तक बैलिस्टिक मिसाइल छोड़ सकती हैं.

लेकिन भूषण कुमार एक ऐसी फिल्म प्रोड्यूस कर रहे हैं, जो हमें फिर से भारत-पाक युद्ध (1971) की तरफ ले जाती है.शायद ये बताने के लिए कि बेशक आज दुनिया के पास अरबों खरबों डॉलर की सब्मरीन्स हों, लेकिन 71 का वो एक समय ऐसा भी था जब पाकिस्तान की पैरवी के लिए अमेरिका ने अपनी टास्क फोर्स 74 के साथ अपने सबसे धाकड़ विमान वाहक युद्ध पोत यूएसएस एंटरप्राइज (परमाणु-सक्षम) को बंगाल की खाड़ी में भेजा तो था, लेकिन भारत युद्ध में अपनी पकड़ और बढ़त पहले ही तय कर चुका था, क्योंकि इस तैनाती से बस चंद रोज पहले भारतीय नौसेना द्वारा ऑपरेशन ट्राइडेंट को सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा चुका था. रजनीश घई निर्देशन में बन रही फिल्म ‘कराची अटैक’ ऑपरेशन ट्राइडेंट पर आधारित है, जो कि एक आक्रामक कार्रवाई के तौर पर कराची हार्बर को निशाना बनाते हुए लांच किया गया था. मिशन के तहत पहली बार इस क्षेत्र में एंटी-शिप मिसाइल्स का इस्तेमाल हुआ था, जिसके युद्ध बेड़े में आईएनएस वीर सहित कई छोटे-बडे विध्वंसक, सतह से सतह पर 74 किमी तक मार करने वाली रूसी मिसाइलें अदि शामिल की गई थीं.

निश्चित रूप से टैंक, लड़ाकू विमान, युद्ध पोत इत्यादि को केन्द्र में रखकर बनाई गई फिल्में अपनी खूबियों के चलते रोमांच तो पैदा करती हैं. कहानी अतीत की हो, सामयिक या काल्पनिक अगर अच्छी सज्जा के साथ हो तो दर्शकों को भाती भी है.

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