‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में’ गाने का बरेली से नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन से है कनेक्शन, पढ़िए दिलचस्प किस्सा


नई दिल्ली. 1966 में रिलीज हुई साधना (Sadhana ) और सुनील दत्त (Sunil Dutt) स्टारर फिल्म ‘मेरा साया’ (Mera Saaya) का प्रसिद्ध गाना ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में’ गाना जबरदस्त हिट हुआ था. इस गाने पर तमाम लड़कियों ने साल 1966 से लेकर अब तक झूम-झूम कर डांस किया है.  इस गाने को सुनने के बाद हर किसी को यही लगता है कि फिल्म का बरेली से कोई न कोई कनेक्शन जरूर होगा…लेकिन जिस गाने ने बरेली के झुमके को दुनिया भर में मशहूर कर दिया उसका कनेक्शन बरेली से है ही नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन की पर्सनल लाइफ से है. चलिए बताते हैं इस गाने की मेकिंग का दिलचस्प किस्सा.

हिंदी सिनेमा में कई गानों की मेकिंग का किस्सा बड़ा ही दिलचस्प है. किसी गीतकार के मन में कोई गाना कब आ जाए और वह कहां फिट हो जाए, इसका एक बड़ा ही दिलचस्प पहलू होता है. ऐसा ही गाना है ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में’. हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध गीतकार और शायर राजा मेहदी अली खान ने जब इस गीत को लिखा होगा तो उन्हें भी इल्म नहीं होगा कि ये गाना एक दिन इस कदर मशहूर हो जाएगा. दरअसल, राजा मेहदी अली खान अक्सर बरेली आया जाया करते थे और उनकी दोस्ती अमिताभ बच्चन के पिता और प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय बच्चन थी. ये बात सन 1941 की है तब सिर्फ भारत था. हिंदुस्तान-पाकिस्तान नहीं था, क्रिसमस की छुट्टियां चल रही थीं, और हरिवंश राय थोड़े गमगीम थें क्योंकि कुछ वक्त पहले ही वह अपने पिता और पहली पत्नी दोनों को ही खो चुके थें.

अमिताभ के माता-पिता की बरेली में हुई  थी पहली मुलाकात
मीडिया रिपोर्ट की माने तो अंदर से पूरी तरह टूट चुके हरिवंश राय बरेली में अपने दोस्त जो पेशे से प्रोफेसर थें, उनके घर पर आए हुए थे.  उन प्रोफेसर साहब के घर तेजी सूरी भी पहुंचीं हुई थीं. प्रोफेसर साहब के घर चाय पर बच्चन साहब और तेजी सूरी की पहली मुलाकात हुई. तेजी को बच्चन साहब पसंद आए.तेजी उन दिनों लाहौर के ‘ख़ूब चंद डिग्री कॉलेज’  में सायकोलॉजी पढ़ाती थीं. वहां की प्रिंसिपल प्रेमा जौहरी बरेली की ही रहने वाली थीं और तेजी की अच्छी दोस्त भी थीं..उन्हें जब तेजी के दिल की बात पता चली तो, उन्होंने दोनों के मिलन में काफी मदद की.

हरिवंश राय बच्चन-तेजी बच्चन का मिला था दिल
साल के आखिरी दिन 31 दिसंबर की रात को बरेली के प्रसिद्ध वकील रामजी शरण सक्सेना के घर पर पार्टी रखी गई थी. इस कार्यक्रम में में तेजी और बच्चन साहब की मुलाकात हुई. बच्चन साहब को नए साल पर एक कविता सुनाने का आग्रह किया. तो जैसे ही बच्चन साहब ने कहा ‘उस नयन में बह सकी कब इस नयन की अश्रुधारा’ तो तेजी जी की आंख भर गई और उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी और कहते हैं कि हरिवंश राय बच्चन भी अपने आंसू रोक नहीं पाए, दो दिल करीब आए और कुछ ऐसा हुआ कि 1941 की नए साल की सुबह में सब-कुछ पूरी तरह से बदल चुका था. दोनों की इनकी सगाई हो गई. 4 जनवरी, 1941 को इलाहाबाद के जिला मजिस्ट्रेट की अदालत में हरिवंश बच्चन ने अपना विवाह रजिस्टर कराया. वह दौर आज की तरह मॉडर्न नहीं था, तो ये शादी किसी विवाद से कम नहीं थी…खैर तेजी अपने परिवार का आशीर्वाद लेने के लिए लाहौर चली गईं तो बच्चन साहब इलाहाबाद जाकर शादी की तैयारियों में जुट गए.

राजा मेहदी अली खान भूल नहीं तेजी बच्चन की बात
शादी होने के पहले भी कवि सम्मेलनों और पार्टियों में अक्सर उनकी मुलाकात होती रहती थी और दोस्त मंडली शादी के बारे में पूछती रहती. ऐसे ही एक कार्यक्रम में राजा मेहदी भी थे. जब तेजी जी से पूछा गया कि ये सब कब तक चलेगा तो तेजी ने बड़े ही खूबसूरत अंदाज में कहा कि ‘मेरा झुमका तो बरेली के बाजार में गिर गया है’. इसका मतलब शायद यही रहा होगा कि दिल कवि से लग चुका है..खैर जो भी रहा हो.. ये बात शायद वहां मौजूद लोग भूल गए होंगे, शायद खुद हरिवंश राय बच्चन को भी याद नहीं रहा होगा लेकिन मेहदी साहब के जेहन में ये लाइनें चस्पा हो गईं. जब 1966 में ‘मेरा साया’ फ़िल्म के लिए गीत लिखने की बात चली तो उन्हें यह किस्सा याद आ गया और रच डाला पूरा गाना.. ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में’…जिसे मदन मोहन ने संगीत से सजाया और आशा भोसले ने गाया और एक्ट्रेस साधना ने अपने खास अंदाज में इसे मशहूर कर दिया.

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