जॉनी वॉकर की एक्टिंग देख जब गुरु दत्त हो गए थे हैरान, मुरीद होकर दिया उन्हें उनका फिल्मी नाम


नई दिल्ली: जॉनी वॉकर (Johnny Walker) का नाम सामने आते ही चेहरे पर मुस्कान छा जाती है. उनका असली नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी था, जो फिल्म में जॉनी वॉकर के नाम से मशहूर हुए. उन्होंने फिल्मों में शराबी का रोल ऐसे निभाया, मानो वे सच में नशे में रहे हों, पर वे शराब पीते ही नहीं थे. घर की माली हालत उन्हें परिवार सहित बॉम्बे खींच लाई. वे बॉम्बे में बस कंडक्टर की नौकरी करने लगे. जॉनी वॉकर को सिनेमा से लगाव था.

वे फिल्में देखते ही नहीं थे, बल्कि उनमें दिखाए गए सीन और स्टंट भी दोहराया करते थे. उन्हें नूर मोहम्मद चार्ली की अदाकारी पसंद थी. वे कंडक्टरी करते हुए यात्रियों का मनोरंजन करते. वे बस स्टॉप पर लोगों को बड़े अनोखे अंदाज में बुलाते की लोग उन पर ध्यान दिए बिना रह नहीं पाते. वे अक्सर किसी मौके की तलाश में फिल्म स्टूडियो के चक्कर लगा आते थे. वे एक दिन डायरेक्टर के. आसिफ के सचिव रफीक से मिले, जिसकी बदौलत उन्हें फिल्म ‘आखिरी पैमाने’ में छोटा सा रोल मिल गया.

गुरु दत्त को जब लगा कि जॉनी वॉकर ने सच में शराब पी है
जॉनी वॉकर को उम्मीद थी कि कभी-न-कभी उनकी एक्टिंग पर किसी पारखी की नजर पड़ेगी. हुआ भी ऐसा. एक दिन हिंदी फिल्म जगत के मशहूर एक्टर बलराज साहनी की नजर उन पर गई. बलराज साहनी ने उन्हें शराबी की एक्टिंग गुरु दत्त के सामने भी करने के लिए कहा. जब उन्होंने गुरु दत्त के सामने शराबी की एक्टिंग की, तो उन्हें लगा कि जॉनी ने सच में शराब पी है. गुरु दत्त उनकी कला से प्रभावित हुए और उन्हें अपनी फिल्म ‘बाजी’ में काम करने का मौका दिया. तब गुरु दत्त ने उन्हें उनका फिल्मी नाम जॉनी वॉकर दिया.

जॉनी वॉकर का कॉमेडी से जब मोहभंग हुआ
जॉनी वॉकर मूल रूप से एक कॉमेडियन थे. वे ज्यादातर फिल्मों में मजाकिया रोल में नजर आए, लेकिन जिंदगी के आखिरी पड़ाव में उनका कॉमेडी से मोहभंग हो गया. उन्होंने एक बार कहा था, ‘पहले, कॉमेडियन का एक रुतबा था, जिनके रोल को नायक के बराबर महत्व दिया जाता था. अब हास्य का टच देने के लिए ही उनका इस्तेमाल होता है.’

जॉनी वॉकर कई यादगार फिल्मों का रहे हिस्सा
‘मेरे महबूब’, ‘सीआईडी’, ‘चोरी चोरी’ जैसी फिल्मों में उनके निभाए किरदार सिर्फ सफल ही नहीं थे, बल्कि इनकी बदौलत वे एक स्टार बन गए थे. वे 50-60 के दशक में अपने फिल्मी करियर की ऊंचाई पर थे, लेकिन गुरु दत्त के निधन ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था. उन्होंने बिमल रॉय और विजय आनंद जैसे उम्दा निर्देशकों के साथ भी काम किया था.

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