दास्तान-गो : पद्मिनी कोल्हापुरे…तुमसे मिलकर न जाने क्यूं और भी कुछ याद आता है!


दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़…

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जनाब, साल 1980 के बाद वाली दहाई में जो लोग जवान हुए हैं न, उनसे हिन्दी फिल्मों की अदाकाराओं के नाम पूछिए. वे जो नाम गिनाएंगे, उनमें एक मशहूर चेहरा ज़रूर होगा, पद्मिनी कोल्हापुरे. और इस चेहरे को याद करते ही इन सभी को याद आएगी राज कपूर साहब की फिल्म ‘प्रेम रोग’ (1978). साथ ही इसके ख़ूब मशहूर हुए गाने ‘ये गलियां ये चौबारा, यहां आना न दोबारा…’, ‘मैं हूं प्रेम रोगी, मेरी दवा तो कराओ…’, ‘मोहब्बत है क्या चीज़…’, ‘भंवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राज कुंवर…’ और ‘मेरी किस्मत में तू नहीं शायद’.  इसी तरह उस दौर की एक और फिल्म ‘प्यार झुकता नहीं’ (1985) भी तुरंत याद हो आएगी. इस फिल्म ने सिनेमाघरों की टिकट खिड़की पर तमाम रिकॉर्ड तोड़े और कई नए बना डाले थे. इसके गाने भी ख़ूब मशहूर हुए. उनमें से एक को तो आज तक लोग जहां-तहां गुनगुनाते हैं, ‘तुमसे मिलकर न जाने क्यूं और भी कुछ याद आता है…’

और ये जो गाना है न जनाब, ‘तुमसे मिलकर न जाने क्यूं…’ इसकी शुरुआती लाइनें पद्मिनी कोल्हापुरे की दास्तान कहने के लिए तो एकदम सटीक बैठती हैं. क्योंकि पद्मिनी की कहानी के पहलू कोई एक या एक जैसे नहीं, बल्कि मुख़्तलिफ़ रंगों वाले हैं. इसमें बहुत-कुछ उजला है तो, कुछ फीका सा भी है. स्याह है. लिहाज़ा, आज, एक नवंबर को जब पद्मिनी का जन्मदिन है तो मुकम्मल तरीके से उनकी शख़्सियत के बारे में बात करने के लिए इन तमाम पहलुओं का कम-ज़्यादा ही सही, ज़िक्र जरूरी सा हो जाता है. इस ज़िक्र-ए-शख़्सियत की शुरुआत होती है, साल 1965 से. वह साल, जब पद्मिनी जी का जन्म होता है. शास्त्रीय गायक और संगीतकार पंढरीनाथ कोल्हापुरे और उनकी पत्नी निरुपमा की छांव में उनकी पैदाइश होती है. दादा जी कृष्णराव कोल्हापुरे मराठी नाट्य-संगीत की दुनिया में बड़ा नाम रहे हैं. इस क्षेत्र में उनकी अपनी ‘बलवंत नाटक कंपनी’ रही है.

इतना ही नहीं, पंढरीनाथ जी रिश्ते में मशहूर गायिकाओं लता और आशा (भोसले) मंगेशकर के भाई लगते हैं. इस नाते भी उनका और उनके परिवार का रुतबा बंबई के फिल्म, संगीत की दुनिया में बढ़िया है. लता और आशा ताई का पद्मिनी जी के घर आना-जाना लगा रहता है. इनमें से ख़ासकर जब आशा ताई आती हैं तो वे पद्मिनी का डांस देखने की फ़रमाइश ज़रूर करती हैं. देखती भी हैं. और तभी पद्मिनी की दादी उनसे इसरार करती हैं, ‘आशा, इस लड़की को बड़ा शौक़ है डांस और एक्टिंग का. तुम देखो न कहीं कुछ’.  वैसे, कृष्णराव जी की ख़्वाहिश है कि उनकी बेटी गायिका बने. वे ख़ुद अच्छे गाने वाले शाग़िर्दों को तैयार किया करते हैं. तो कभी-कभार पकड़कर बेटियों को भी साथ बिठा लेते हैं. इनमें से बड़ी बेटी शिवांगी (अदाकारा श्रद्धा कपूर की मां) तो जैसे-तैसे गाना सीख भी लेती है. लेकिन बीच वाली पद्मिनी और छोटीे तेजस्विनी का ज़्यादा मन नहीं लगता इसमें.

Padmini Kolhapure

पद्मिनी का तो स्कूल में भी ज़्यादा मन नहीं लगता. लिहाज़ा, जब जैसे ही मौका मिलता है, दीदीआत्या (लता जी के लिए संबोधन) या आत्या (आशा जी के लिए) के ज़रिए फिल्म-स्टूडियो चली जाती है. वहां रिकॉर्डिंग, शूटिंग देखा करती है. और ऐसे ही, खेल-खेल में बाल-कलाकार के रूप में एक-दो फिल्में भी कर लेती हैं. जैसे- ‘आप आए बहार आई’ (1971), ‘एक खिलाड़ी बावन पत्ते’ (1972), वग़ैरा. इस वक़्त उम्र छह-सात बरस ही गुज़री है. इसी दौरान देवआनंद साहब फिल्म बना रहे हैं, ‘इश्क़, इश्क़, इश्क़’ (1974 में आई). आशा जी के गाने ‘वल्लाह क्या नज़ारा है…’ की रिकॉर्डिंग है. तभी मौका पाकर देव-साहब से पद्मिनी की बात छेड़ देती हैं आशा जी, ‘ये मेरी भतीजी है. डांस अच्छा करती है. गाती भी है. देखिए न, इसके लिए मौका बने तो?’ ‘अरे, हां, हां, क्यूं नहीं. इधर आओ बेटा…’. और देव-साहब अब पद्मिनी को गोद में बिठाए पूछ रहे हैं, ‘तुम मेरी फिल्म करोगी?’.

‘अंधा क्या चाहे, दो आंखें’, पद्मिनी ने तुरंत हां कर दी है. घर पहुंचकर घरवालों को इस वाक़ि’अे की इत्तिला दी है. लेकिन किसी के ‘छोटी-पद्मिनी’ पर यक़ीन नहीं होता. पर अगले दिन हो जाता है, जब देव-साहब पद्मिनी का पासपोर्ट मंगवाते हैं और कुछ देर में शूटिंग के लिए उसे अपने साथ नेपाल ले जाते हैं. हालांकि ये फिल्म टिकट-खिड़की पर चलती नहीं. इससे एक-दो साल यूं ही निकल जाते हैं. मगर पद्मिनी पर फिल्म वाले अब ग़ौर करने लगे हैं. वह ख़ुद भी नाटकों में अदाकारी करने लगी हैं. उन्हीं में से किसी एक नाटक में उनके काम पर राज कपूर साहब की निग़ाह पड़ जाती है. वे इस वक़्त  ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ (1978 में आई) फिल्म बना रहे हैं. इसमें उन्हें अदाकारा ज़ीनत अमान के बचपन के किरदार के लिए कोई अच्छी बच्ची चाहिए. और पद्मिनी उन्हें इसके पूरी तरह सही लगती है. फिल्म के लिए राज-साहब उसे लेते हैं. और यहां एक बड़ा वाक़ि’आ घटता है.

लता जी को ‘यशोमति मैया से बोले नंदलाला…’ गाने की रिकॉर्डिंग करनी है. यह गाना पद्मिनी पर फिल्माया जाना है. लेकिन ‘दीदीआत्या’ होने के बावज़ूद अपनी मशरूफ़ियत की वजह से उन्हें अभी ठीक-ठीक पता नहीं कि पद्मिनी गाती किस तरह है. लिहाज़ा, गाने की रिकॉर्डिंग से ठीक पहले वे पद्मिनी को बुलवा भेजती हैं. पता चला कि वह स्कूल में है तो वहां से बुलवाया जाता है. और आधे दिन की छुट्‌टी लेकर ‘दीदीआत्या’ के पास पहुंचती हैं पद्मिनी. वहां लता जी उनसे कहती हैं, ‘बेटा, कुछ गाकर सुनाओ. जो तुम्हें आता हो’. पद्मिनी ने उन्हें एक गाना सुनाया और इसके बाद लता जी की रिकॉर्डिंग सुनी. अवाक् रह गई वह क्योंकि लता जी ने हू-ब-हू उसी तरह से गाना गाया है, जैसे वह ख़ुद गाती. आवाज़ भी पूरी तरह उसी के जैसी. और वह तो क्या, आज बरसों बरस बाद तक सुनने वाले भी अवाक् रह जाया करते हैं, जब उन्हें किसी तरह इस गाने की सच्चाई का इल्म होता है.

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फिल्म ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ की कामयाबी के बाद तो पद्मिनी जी को पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत ही नहीं लगी. ‘ड्रीम गर्ल’ (1977) में वह हेमा मालिनी जी के संग काम कर रही हैं, तो ‘साजन बिना सुहागन’ (1978) में नूतन जी के साथ. और भी फिल्में आ रही हैं. लेकिन तभी बीच में आ जाता है एक स्याह दौर. साल 1980 का है. एक फिल्म आई है ‘गहराई’. तंत्र-मंत्र पर आधारित है. इसमें पद्मिनी बिना कपड़ों के नज़र आती हैं. इसी साल एक और फिल्म आती है, ‘इंसाफ़ का तराजू’. बीआर चोपड़ा जैसे बड़े फिल्मकार इसमें छह-सात मिनट का बलात्कार का एक सीन डालते हैं. कहानी की ज़रूरत बताते हुए. यह पद्मिनी पर ही फिल्माया गया है. फिर, इसी साल ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स का हिन्दुस्तान आना होता है. यहां एक जलसे के दौरान पद्मिनी सबके सामने गाल पर उन्हें चुंबन दे देती हैं. सुर्ख़ियां पाती हैं. सुर्ख़यां बनती हैं और बात निकलती है तो दूर तक जाती है.

ग़ौर कीजिए, यह वही पद्मिनी हैं, जिनके पीछे इतने बड़े-बड़े लोगों का नाम जुड़ा हुआ है. ये वही पद्मिनी हैं, जो ठेठ मराठी बरहमन ख़ानदान से त’अल्लुक़ रखती हैं. ये वही पद्मिनी हैं, जिनका साथ देने के लिए मां ने इंडियन एयरलाइंस की नौकरी छोड़ दी है. ये वही पद्मिनी हैं, जिनके पिता जी रात 10 बजे तक, शूटिंग पूरी हो या न हो, उन्हें घर वापस ले जाया करते हैं. वही पद्मिनी 15-16 बरस की उम्र में इतने आगे निकल आई हैं कि देश और उससे बाहर भी लोग उन्हें ‘दीगर वज़हों’ से जानने लगे हैं.  हालांकि ख़ानदानी संस्कार ऐसे हैं कि वे जल्द ही अपनी सही राह वापस पकड़ लेती हैं. और एक बार फिर इसमें मददगार बनते हैं उनके अपने राज अंकल यानी राज कपूर साहब.

फिल्मकार नासिर हुसैन साहब फिल्म बना रहे हैं,  ‘ज़माने को दिखाना है’. उन्होंने अपनी तीन फिल्मों के लिए पद्मिनी के साथ बतौर हीरोइन करार किया है. राज कपूर साहब को जब ये बात पता चलती है तो वे चौंकते हैं, ‘अरे पद्मिनी इतनी बड़ी हो गई क्या… बुलाओ उसे’. वे फिल्म बना रहे हैं, ‘प्रेम रोग’, अपने बेटे ऋषि को लेकर. सो वे भी इसके लिए पद्मिनी को साथ ले लेते हैं. नासिर साहब के साथ करार में बंधे होने के बावजूद. वह राज-साहब थे, उन्हें कौन न कहता भला. तब ‘बड़े फिल्मकारों’ के बीच यह तय होता है कि कौन सी फिल्म पहले रिलीज़ होगी.  लेकिन जनाब, दो के गुत्थमगुत्था होने पर अक्सर फ़ायदा तीसरे को हो ही जाया करता है. यहां भी हुआ, डायरेक्टर इस्माइल श्रॉफ़ को. उन्होंने भी इसी दौरान पद्मिनी जी के साथ ‘आहिस्ता-आहिस्ता’ फिल्म बना ली थी. उसे उन्होंने रिलीज़ कर दिया. अलबत्ता दर्शकों को पद्मिनी जी के साथ प्रेम रोग लगा ‘प्रेम रोग’ से ही.

और इसके बाद जो पद्मिनी जी का सफ़र चला तो उस पर न कोई दाग आया, न धब्बा. यहां बता देना ठीक होगा जनाब, कि बीते ज़माने में दूरदर्शन के ‘डीडी-भारती’ चैनल पर एक कार्यक्रम आया करता था. नाम था उसका ‘कोशिश से क़ामयाबी तक’. उस कार्यक्रम में पद्मिनी जी ने ख़ुद अपनी ज़िंदगी और फिल्मी सफ़र के बारे में तमाम बातें साझा की थीं. हालांकि उन्होंने स्याह पहलुओं का ज़िक्र नहीं किया था उसमें. लेकिन इस तरह की चीज़ें भी छिपती कहां हैं. ख़ैर!

आज के लिए बस इतना ही. ख़ुदा हाफ़िज़.

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